देहरादून, खबर न्यू  इंडिया (न्यूज़ डेस्क) : उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत हरिद्वार जमीन घोटाले में दो IAS और एक PCS अफसर समेत 12 लोग सस्पेंड कर दिए गए हैं। धामी सरकार का यह कदम न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त संदेश है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की नई मिसाल भी है. मामले में दो आईएस और एक पीसीएस अफसर समेत कुल 12 लोगों को सस्पेंड कर दिया गया है। मामले में डीएम, एसडीएम और पूर्व नगर आयुक्त पर भी गाज गिरी। अब विजिलेन्स जमीन घोटाले की जांच करेगी। मुख्यमंत्री ने पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच सतर्कता विभाग से कराए जाने के निर्देश दिए हैं ताकि दोषियों की पूरी श्रृंखला का खुलासा हो सके और पारदर्शिता बनी रहे। इसके अतिरिक्त, उक्त भूमि घोटाले से संबंधित विक्रय पत्र को निरस्त करते हुए भूस्वामियों को दिए गए धन की रिकवरी सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश भी दिए गए हैं। मुख्यमंत्री ने तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी के कार्यकाल के दौरान नगर निगम हरिद्वार में हुए सभी कार्यों का विशेष ऑडिट कराए जाने के निर्देश दिए हैं ताकि वित्तीय अनियमितताओं की समुचित जांच की जा सके।

जिन अधिकारियों पर कार्रवाई की गई, उनमें कर्मेन्द्र सिंह, जिलाधिकारी (डीएम) शामिल हैं. भूमि क्रय की अनुमति देने और प्रशासनिक स्वीकृति देने में उनकी भूमिका संदेहास्पद पाई गई. वरुण चौधरी, पूर्व नगर आयुक्त, हरिद्वार, उन्होंने बिना उचित प्रक्रिया के भूमि क्रय प्रस्ताव पारित किया और वित्तीय अनियमितताओं में प्रमुख भूमिका निभाई.

कई दूसरे अधिकारी भी निलंबित

इसके अलावा अजयवीर सिंह, एसडीएम के खिलाफ कार्रवाई की गई है, जिन्होंने जमीन के निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया में घोर लापरवाही बरती है, जिससे गलत रिपोर्ट शासन तक पहुंची. इसके साथ ही निकिता बिष्ट (वरिष्ठ वित्त अधिकारी, नगर निगम हरिद्वार), विक्की (वरिष्ठ वैयक्तिक सहायक), राजेश कुमार (रजिस्ट्रार कानूनगों), कमलदास (मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, तहसील हरिद्वार को भी जमीन घोटाले में संदिग्ध पाए जाने पर तुरंत प्रभाव से निलंबित किया है.

मामला 15 करोड़ की जमीन को 54 करोड़ में खरीदने का है, जिसमें हरिद्वार नगर निगम ने एक अनुपयुक्त और बेकार भूमि को अत्यधिक दाम में खरीदा। न भूमि की कोई तात्कालिक आवश्यकता थी, न ही खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई। शासन के नियमों को दरकिनार कर यह घोटाला अंजाम दिया गया। उत्तराखंड में पहली बार ऐसा हुआ है कि सत्ता में बैठी सरकार ने अपने ही सिस्टम में बैठे शीर्ष अधिकारियों पर सीधा और कड़ा प्रहार किया है।

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