सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक बताते हुए लगाई रोक
खबर न्यू इंडिया (न्यूज़ डेस्क) : इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया और सरकार को किसी अन्य विकल्प पर विचार करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की आलोचना करते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियों को हो रही फंडिंग की जानकारी मिलना बेहद जरूरी है। इलेक्टोरल बॉन्ड सूचना के अधिकार का उल्लंघन है। इतना ही नहीं उच्चतम अदालत ने एसबीआई से 6 मार्च तक चुनावी बॉन्ड की जानकारी देने के लिए कहा है. कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि चंदा रिश्वत का जरिया भी बन सकता है जिससे सरकारी नीतियां प्रभावित हों. इससे पहले CJI ने साफ किया कि फैसले भले ही अलग-अलग हों लेकिन पूरी बेंच का निष्कर्ष एक ही है. कोर्ट ने इस पर विचार किया कि क्या दानकर्ता की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत आती है? कोर्ट ने कॉरपोरेट कंपनी पर इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदा देने की निर्धारित सीमा को हटाने पर भी विचार किया है.
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने मामले पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाया। हालांकि पीठ में दो अलग विचार रहे, लेकिन पीठ ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉन्ड पर रोक लगाने का फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एसबीआई बैंक को 2019 से अब तक चुनावी बॉन्ड की पूरी जानकारी देने का आदेश दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने पिछले साल दो नवंबर को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया।
थी चुनावी बॉन्ड स्कीम?
केंद्र सरकार ने 2018 में चुनावी बॉन्ड योजना की शुरुआत की थी. इसे राजनीतिक दलों को मिलने वाली फंडिंग में पारदर्शिता लाने के प्रयासों के तहत पेश किया गया था. इसे राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले नकद चंदे के विकल्प के रूप में देखा गया था. चुनावी बॉन्ड स्टेट बैंक की 29 शाखाओं में मिलता था. इसके जरिए कोई भी नागरिक, कंपनी या संस्था किसी पार्टी को चंदा दे सकती थी. ये बॉन्ड 1000, 10 हजार, 1 लाख और 1 करोड़ रुपये तक के हो सकते थे. खास बात ये है कि बॉन्ड में चंदा देने वाले को अपना नाम नहीं लिखना पड़ता.
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