देहरादून, खबर न्यू इंडिया (न्यूज़ डेस्क): प्रतिवर्ष 25 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस उन सभी कलाकारों के प्रति आदर और सम्मान व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिन्होंने अपनी कला से समाज को सुंदरता, विचारशीलता और संवेदनशीलता प्रदान की है। यह दिन सिर्फ लोककला, मूर्तिकला या चित्रकला जैसे पारंपरिक रूपों तक सीमित नहीं है, बल्कि संगीत, नृत्य, रंगमंच, सिनेमा, साहित्य और डिजिटल आर्ट जैसी विविध कलाओं को भी सम्मिलित करता है, जो आज के समय में समान रूप से लोकप्रिय हैं। कला का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह समाज को सिर्फ दृष्टिगत सुंदरता ही नहीं देती बल्कि मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक समस्याओं और सांस्कृतिक धरोहर को भी उजागर करती है। कलाकार अपने कार्यों के माध्यम से समाज के विभिन्न पक्षों को प्रकाश में लाते हैं, चाहे वह आधुनिकता हो, परंपरा हो, बदलाव की पुकार हो या फिर गहन आत्मनिरीक्षण। उनके कार्य न केवल मनोरंजन करते हैं बल्कि मानव समाज में एक गहरी छाप छोड़ते हैं और विचारशील संवाद को जन्म देते हैं। यह दिन हमें कलाकारों के जीवन की कठिनाइयों की ओर भी ध्यान दिलाता है। एक कलाकार को अपनी रचनात्मकता को सजीव रखने और अपनी कला के माध्यम से रोज़गार प्राप्त करने के लिए अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से, उन कलाकारों के लिए जो कला के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, इस प्रतिस्पर्धात्मक और अनिश्चित क्षेत्र में स्थिरता प्राप्त करना आसान नहीं होता। अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस का उद्देश्य न केवल कलाकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है बल्कि कला की महत्ता को भी समझना है। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम कला के प्रति जागरूक हों, कलाकारों के प्रयासों का समर्थन करें और उन्हें एक स्थिर और प्रेरणादायक वातावरण प्रदान करें। समाज में कला को प्रोत्साहित करने के लिए कलाकारों को उचित आर्थिक एवं सामाजिक सहयोग की आवश्यकता है ताकि वे अपनी रचनात्मकता को बिना किसी आर्थिक बाधा के बढ़ावा दे सकें। अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस उन सभी कलाकारों के प्रति आदर का प्रतीक है जिन्होंने अपनी कल्पनाओं को आकार देकर एक बेहतर और सजीव दुनिया का निर्माण किया है। आइए इस दिन हम सभी कलाकारों के प्रति सम्मान और उनके कला-सृजन में अपना योगदान देने की प्रतिबद्धता जताएं ताकि कला का यह अनमोल सफर अनवरत चलता रहे।

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देहरादून के देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग ने 25 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस के अवसर पर एक दिवसीय चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया, जिसमें लगभग 50 युवा कलाकारों ने अपने विचारों और परिकल्पनाओं को रंगों के माध्यम से साकार किया। इस कार्यशाला में युवा कलाकारों ने पोस्टर और चित्रों के माध्यम से अपने अद्वितीय दृष्टिकोण का प्रदर्शन किया, जो उनके रचनात्मक विचारों का जीवंत प्रमाण थे।
कार्यशाला के दौरान स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड लिबरल आर्ट की संकाय प्रमुख डॉ. भावना गोयल ने सभी प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते हुए उनकी कला की सराहना की। उन्होंने कलाकारों के कार्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि कलाकार समाज को एक विशेष दृष्टिकोण से देखते हैं, और उनके चित्र समाज को एक नई दिशा में सोचने की प्रेरणा देते हैं। डॉ. गोयल का मानना है कि इस तरह के आयोजन न केवल कला की अभिव्यक्ति को समृद्ध बनाते हैं, बल्कि समाज में रचनात्मकता का संदेश भी फैलाते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कला न केवल एक माध्यम है, बल्कि यह समाज के बदलाव का भी प्रतीक है।

ललित कला विभाग के प्रमुख कार्यवाहक डॉ. राजकुमार पांडे ने इस अवसर पर सभी युवा कलाकारों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि कला का आधार प्रकृति और उसकी खूबसूरती है, और कलाकारों को अपनी कला में इन तत्वों को संजोना चाहिए। उन्होंने गढ़वाल शैली के चित्रों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस प्रकार से भारतीय पहाड़ी क्षेत्र के चित्रों में प्राकृतिक सौंदर्य, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक तत्वों का संगम देखने को मिलता है। डॉ. पांडे ने युवाओं को प्राकृतिक सौंदर्य से प्रेरणा लेने और कला के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखने की सलाह दी। उन्होंने यह भी कहा कि कला में प्रयोगशीलता और नवीनता को अपनाने से ही कलाकार की सृजनात्मकता को नई ऊंचाइयाँ मिलती हैं। सहायक आचार्य डॉ. मंतोष यादव ने जलरंग कला की बारीकियों पर विशेष सत्र का संचालन किया। उनका मानना है कि जलरंग में भावनाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता अधिक होती है और सही तकनीक का प्रयोग कलाकार को उसकी कला को एक नयी ऊंचाई पर पहुंचाने में सहायक होता है। डॉ. यादव ने रंगों की विविधता और उन्हें कैनवास पर सजीव करने के तरीकों को उदाहरणों के साथ प्रदर्शित किया, जिससे सभी प्रतिभागियों को अत्यंत प्रेरणा मिली।

कार्यक्रम के समापन पर सभी कलाकारों ने अपने-अपने चित्रों को प्रदर्शित किया, जिनमें उनकी सृजनात्मकता और नयी सोच का प्रतिबिंब था। विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और सभी कलाकारों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन न केवल विद्यार्थियों के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं बल्कि उनके कला कौशल को निखारने में भी सहायक होते हैं। इस अवसर पर ललित कला विभाग के सहायक आचार्य शमशेर वारसी, दीपशिखा मौर्य, राहुल यादव आदि ने विज्ञापन कला में कला के विभिन्न माध्यमों तथा उसकी उपयोगिता को व्याख्यानवित कियाl वहीं सौम्या रावत, शालिनी भंडारी और भानुदेव शर्मा आदि ने विश्व प्रसिद्ध कलाकारों की कलाकृतियां तथा उनके जीवन संघर्ष अपने विचार व्यक्त तथा अपने योगदान से कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईl देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग द्वारा आयोजित यह कार्यशाला एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जहाँ युवा कलाकारों को अपनी सृजनात्मकता का प्रदर्शन करने और नए दृष्टिकोण प्राप्त करने का अवसर मिला। इस प्रकार की गतिविधियाँ न केवल कला के क्षेत्र में नवीनता लाती हैं बल्कि समाज में कला की महत्वपूर्ण भूमिका को भी दर्शाती हैं।

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